Friday, 28 December 2012

टाटा   समूह की बागडोर सभालेंगे 44 वर्षीय साइरस मिस्त्री 

मिस्त्री को पिछरतन टाटाले साल टाटा का उत्तराधिकारी चुना गया था. इस महीने की शुरुआत में उन्हें औपचारिक तौर पर समूह का चेयरमैन नियुक्त किया गया.
रतन टाटा ने जेआरडी टाटा से समूह की कमान लेने के बाद बतौर चेयरमैन 21 वर्ष तक समूह को नेतृत्व प्रदान किया.
वहीं टाटा संस में 18 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले शपूरजी पलोनजी परिवार के सदस्य मिस्त्री का चयन पांच सदस्यीय चयन समिति द्वारा किया गया.टाटा के कार्यकाल में समूह का राजस्व कई गुना बढ़कर 2011.12 में कुल 100.09 अरब डालर :करीब 4,75,721 करोड़ रुपये: पहुंच गया जो 1971 में महज 10,000 करोड़ रुपये था.
टाटा समूह को एक बहुराष्ट्रीय उद्योग समूह में तब्दील करने की दूरदृष्टि के तहत रतन टाटा के नेतृत्व में समूह ने विदेश में कई कंपनियों के अधिग्रहण किए. इसमें 2000 में ब्रितानवी ब्रांड टेटली का 45 करोड़ डालर में अधिग्रहण शामिल है.
रतन टाटा ने वैश्विक अधिग्रहण के मामले में भारतीय उद्योग जगत में नए मानक स्थापित किए. टाटा स्टील ने 2007 में ब्राजील की सीएसएन को शिकस्त देते हुए कोरस का 6.2 अरब पौंड में अधिग्रहण किया.
इस अधिग्रहण के एक साल बाद ही समूह की वाहन कंपनी टाटा मोटर्स ने 2.3 अरब डालर में जगुआर लैंड रोवर का अधिग्रहण किया.
टाटा ने आम लोगों की कार के सपने को साकार करने के लिए लखटकिया कार नैनो पेश की. हालांकि, इस सपने को पूरा करने के लिए कंपनी को पश्चिम बंगाल के सिंगूर में भूमि अधिग्रहण की समस्याओं से दो.चार होना पड़ा. अंतत: समूह ने परियोजना को सिंगूर से गुजरात के साणंद ले जाने का निर्णय किया.
रतन टाटा के नेतृत्व में समूह ने 90 के दशक में आईटी क्षेत्र में कदम रखा और आज टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी है.
टाटा ने समूह के साथ अपने लंबे सफर को सीखने वाला सफर बताया और साथ ही कहा, ‘‘ समय समय पर हमें निराशाओं का भी सामना करना पड़ा.. फिर भी मैंने मूल्यों एवं नैतिक मानकों को बनाए रखने की कोशिश की.’’
उनका कहना है, ‘‘ मैं इस बात को लेकर संतुष्ट हूं कि जो भी मैंने सही समझा उसे करने का पूरा प्रयास किया.’’
सेवानिवृत्ति के बाद की योजना के बारे में टाटा ने कहा है कि वह प्रौद्योगिकी पर जोकि उनका जुनून है, समय गुजारेंगे. वह अपना पियानो से धूल साफ कर उसके फिर से बजाने लायक बनाएंगे और विमान उड़ाने का शौक पूरा करेंगे. साथ ही वह परोपकारी गतिविधियों पर ध्यान देंगे.
नये चेयरमैन साइरस मिस्त्री से हैं खासी उम्मीदें
टाटा समूह में 2006 में बतौर निदेशक शामिल होने वाले मिस्त्री पर समूह को आगे ले जाने की एक बड़ी जिम्मेदारी होगी. इससे पहले वह 2.5 अरब डालर के निर्माण समूह शपूरजी पलोनजी ग्रुप का बतौर प्रबंध निदेशक नेतृत्व कर रहे थे.
टाटा के उत्तराधिकारी के तौर पर चयनित होने से पहले मिस्त्री ने टाटा समूह की विभिन्न कंपनियों के निदेशक मंडल में गैर.कार्यकारी की भूमिका निभाई है.
चार जुलाई, 1968 को जन्मे साइरस पलोनजी मिस्त्री ने लंदन के इंपीरियल कालेज आफ साइंस, टेक्नोलाजी एंड मेडिसिन से स्नातक की पढ़ाई पूरी की. उन्होंने लंदन बिजनेस स्कूल से प्रबंधन में मास्टर डिग्री भी ली है.
वर्ष 1991 में शपूरजी पलोनजी ग्रुप में बतौर निदेशक शामिल होने वाले मिस्त्री ने समूह को नयी ऊंचाइयों पर पहुंचाया. इस समूह में 23,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और इसकी उपस्थिति भारत के अलावा पश्चिम एशिया और अफ्रीका में है.

उत्सुक होकर बच्चो ने कलाम साहब से सिखा विज्ञानं के गुर
विज्ञानं को चुनौती के रूप में लिया स्कूली बच्चो ने

पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइलमैन डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम ने सोमवार को दरभंगा स्थित विज्ञानं मेले में कहा कि विज्ञान में क्रांति से ही भविष्य की चुनौतियों का सामना संभव है। बिहार में विज्ञान, कृषि व पर्यटन के क्षेत्रों में विकास की अपार संभावनाएं हैं। बच्चों में विज्ञान के क्षेत्र में उड़ान भरने की चाहत है। बस नई पीढ़ी को संवारने की जरूरत है। वे लहेरियासराय स्थित पंडित नेहरू स्टेडियम में आयोजित तीन दिवसीय मेगा साइंस फेयर के उद्घाटन के बाद महती सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बिहार के बच्चों में आगे बढ़ने की तमन्ना है, इसके लिए उचित मार्गदर्शन व रास्ता चाहिए। मेगा साइंस फेयर इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। पिछले सात साल से बिहार विज्ञान में क्रांति से ही चुनौतियों का सामना में विकास, शांति व समृद्धि के लिए काम हो रहा है। यहां कृषि व कृषि पर आधारित उद्योगों के विकास की अपार संभावनाएं हैं। मगर कृषि योग्य भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजन इसमें बाधक है। यह एक ज्वलंत समस्या है। इसका समाधान किसान को-ऑपरेटिव के विकास से ही संभव है। राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। यहां अनाज रखने के लिए गोदामों की कमी है। मूल्य पर नियंत्रण नहीं है एवं बाजार पर कुछ लोगों का कब्जा है। इससे निपटने के लिए बिहार सरकार सामुदायिक कृषि बाजार पद्धति का विकास करे। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि बिहार में पर्यटन के विकास की असीम संभावना है। सूबे में हो रहा वैज्ञानिक चेतना का विकास : नीतीश : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि सूबे में वैज्ञानिक चेतना का विकास हो रहा है। यह नई पीढ़ी का सौभाग्य है कि आज हमारे बीच कलाम साहब जैसे वैज्ञानिक हैं। हमें इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। मुख्यमंत्री नेहरू स्टेडियम में तीन दिवसीय मेगा साइंस फेयर के उद्घाटन के बाद जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यहां की नई पीढ़ी में विज्ञान के प्रति आकर्षण बढ़ा है। अतीत में भी बिहार विज्ञान का केंद्र था। यह राज्य फिर से विज्ञान का केंद्र बनेगा। इस कड़ी में आर्यभट्ट ज्ञान व अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। विज्ञानं के विकास  में स्कूली बच्चो का योगदान को लेकर बिहार में यह दूसरी बार आयोजन है .जुलाई में भी इसी तरह का आयोजन औगेस्ट फाउंडेशन तथा विकशित भारत फाउंडेशन की ओर से विद्यालयों में किया गया था . 24 दिसंबर को इसी आयोजन का अगली करी के रूप में सौ से अधिक बचचो ने कलम साहब से प्रत्यक्ष विज्ञानं के गुर को शिखा . नए उपकरण भी प्राप्त किये .

Monday, 3 December 2012

NIRALA NIKETAN BANA TRUST

  हिन्दी के महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का सपना आखिरकार साकार हुआ। निराला निकेतन को ट्रस्ट बनाने की उनकी अंतिम इच्छा को शुक्रवार को मूर्त रूप दे दिया गया। उनके नाम पर ही इसका नामकरण हुआ है। इसकी संस्थापक ट्रस्टी बनीं हैं उनकी पत्नी छाया देवी। शुक्रवार की शाम जिला निबंधन अधिकारी ने उनके आवास पर जाकर निबंधन की सारी कार्यवाही पूरी की।
जानकारी के मुताबिक सात अप्रैल 2010 को शास्त्री जी के निधन के बाद से ही उनकी पत्नी निराला निकेतन को ट्रस्ट बनाने के लिए प्रत्यनशील रहीं। उनका कहना था कि आचार्यश्री की अंतिम इच्छा निराला निकेतन को ट्रस्ट बनाने की थी, ताकि यह सुरक्षित रह सके। यहां की सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण हो। विगत डेढ़ वर्ष में कई बार योजना बनी, लेकिन धरातल पर नहीं उतर सकी। आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ट्रस्ट एक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में निबंधित हुआ है। निबंधन शुल्क मात्र एक हजार रुपये लिया गया है।
ये है चल-अचल संपत्ति : निराला निकेतन 15 कट्ठा अर्थात 65 डिसमिल पर बसा है। 15 सौ स्क्वायर फीट में भवन बना हुआ है। पुस्तकालय में करीब एक हजार पुस्तकें हैं जिनकी कीमत करीब 25 हजार रुपये है। संपत्ति की कुल कीमत 2 करोड़ आंकी गई है। साथ ही आचार्यश्री के निधन के बाद किसी तरह का पुरस्कार प्राप्त होने या रॅायल्टी या धरोहर आदि मिलने पर उस पर जीवनभर उनकी पत्नी का अधिकार होगा।
ट्रस्ट में ये होंगे शामिल : अध्यक्ष छाया देवी के अलावा संरक्षक मंडल में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विवि वर्धा के कुलाधिपति डॉ. नामवर सिंह, अवकाश प्राप्त आइएएस नई दिल्ली अशोक वाजपेई, एडीजीपी बिहार गुप्तेश्वर पाण्डेय, डीएम मुजफ्फरपुर पदेन सदस्य व एमएलसी देवेश चंद्र ठाकुर। इनके अलावा उपाध्यक्ष प्रो. रामप्रवेश सिंह, सचिव डॉ. गोपेश्वर सिंह अध्यक्ष हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय, जयमंगल मिश्र कार्यकारी सचिव, डॉ. रश्मि रेखा कोषाध्यक्ष, डॉ. कल्याण कुमार झा सदस्य होंगे।

deshratan rajender babu ki jayanti par phool arpit karte cm d cm

राम बालक रॉय<
br /> 03 दिसंबर 2012

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंदर प्रसाद का आज 03 दिसम्बर 2012 को पुरे प्रदेश में धूमधाम से उनकी जयंती मनाई गयी . सूबे के मुखिया नितीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी  गवरनर देवानंद कोंवर सूबे के मंत्री श्याम रजक  आदि ने भी उनके चित्र पर मलायार्पण किया . जन लेते है कुछ उनके बारे में



डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 03 दिसंबर 1884 को और  मृत्यु 28 फरवरी 1963 मे हुई थी । वह स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और स्वाधीनता आंदोलन मे उनकी अग्रणी भूमिका रही थी। उनकी मृत्यु के 48 वर्ष बाद भी उनके विचारों की प्रासंगिकता आज भी है और आज का राजनीतिक संकट उन विचारों से हट जाने के कारण ही उत्पन्न हुआ है।

राजेन्द्र बाबू का जन्म एक जमींदार परिवार मे हुआ था और उन्हें सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त थीं। वह काफी प्रतिभाशाली थे। वकालत पास करने के बाद यदि प्रेक्टिस करते तो और धनशाली ही बनते। किन्तु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें बुला कर उनसे कहा कि तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं है और वकालत करके खूब पैसा कमा लोगो लेकिन मै चाहता हूँ कि तुम देश-सेवा मे लगो  तो तुम्हारी प्रतिभा का लाभ देशवासियों को भी मिल सके। राजेन्द्र बाबू ने गोखले जी की सलाह को आदेश मान कर शिरोधार्य कर लिया और आजीवन उसका निर्वहन किया। जन्म से प्राप्त सुख-सुविधाओं का परित्याग करके सादगी ग्रहण करके राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन मे कूद पड़ना राजेन्द्र बाबू को असहज नहीं लगा।

गांधी जी और नेताजी सुभाष के मध्य मतभेद होने की दशा मे सुभाष बाबू ही 'नीलकंठ' बन कर सामने आए और कांग्रेस की अध्यक्षता सम्हाली। निराश-हताश कांग्रेसियों मे नव-जीवन का संचार करके राजेन्द्र बाबू ने अपने कुशल नेतृत्व से स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा दी। स्वातंत्र्य -समर के योद्धा के रूप मे राजेन्द्र बाबू को कई बार जेल-यात्राएं भी करनी पड़ी। जेल मे भी चिंतन-मनन उनकी दिनचर्या रहते थे। यहाँ तक कि जब एक बार जेल मे उनको कागजों का आभाव हो गया तो उन्होने कागज के नोटों पर भी अपने विचार लिख कर रख लिए थे। 'खंडित भारत' की रचना भी उन्होने जेल-प्रवास के दौरान ही की थी। इस पुस्तक से राजेन्द्र बाबू की दूर-दर्शिता का आभास होता है जो उन्होने आजादी से काफी पहले विभाजन से होने वाले दुष्परिणामों की कल्पना कर ली थी। लेकिन अफसोस कि उनकी सीख को नजर-अंदाज कर दिया गया और नतीजा भारत,पाकिस्तान तथा बांग्ला देश की जनता आज तक भोग रही है।

राष्ट्रपति बनने पर उन्होने 'राष्ट्रपति भवन' से रेशमी पर्दे आदि हटवा कर खादी का सामान -चादर,पर्दे आदि लगवाए थे जो उनकी सादगी-प्रियता का प्रतीक है। वह विधेयकों पर आँख बंद करके हस्ताक्षर नहीं करते थे बल्कि अपने कानूनी ज्ञान का उपयोग करते हुये खामियों को इंगित करके विधेयक को वांछित संशोधनों हेतु वापस कर देते थे और सुधार हो जाने के बाद ही उसे पास करते थे। उनके लिए जनता का हित सर्वोप्परि था। स्व . फख़रुद्दीन अली अहमद  द्वारा विदेश मे एमेर्जेंसी पर और श्री ए पी जे कलाम साहब द्वारा बिहार की राजद सरकार हटा कर राष्ट्रपति शासन लगाने के आदेश विदेश से देना राष्ट्रपति पद का अवमूल्यन करना है और  जो राजेन्द्र बाबू की नीतियों के उलट है। उनके उत्तराधजीकारी डॉ राधा कृष्णन भी कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नाडार के षड्यंत्र मे फंस कर एक बार तो संविधान विरोधी कार्य मे तत्पर हो गए थे जो नेहरू जी की सतर्कता से विफल हो गया था। किन्तु डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी ने नेहरू जी से तमाम मतभेदों के बावजूद कभी भी संविधान विरोधी कदम उठाने की बात नहीं सोची जबकि उन्हें तो जनता और सत्तारूढ़ पार्टी मे आदर -सम्मान भी प्राप्त था और समर्थन भी मिल सकता था।

आम धारणा है कि संविधान निर्मात्री समिति के चेयरमेन डॉ भीम राव अंबेडकर ही संविधान निर्माता हैं परंतु संविधान सभा के सभापति की हैसियत से राजेन्द्र बाबू का संविधान निर्माण मे अमिट योगदान है। उनकी कुशल अध्यक्षता मे ही संविधान की धाराओं पर सम्यक विचार-विमर्श और बहसें सम्पन्न हुई। 26 जनवरी 1950 से लागू संविधान डॉ राजेन्द्र प्रसाद के हस्ताक्षरों से ही पारित हुआ है। अतः उनके योगदान को नकारा नहीं जाना चाहिए ।

संसद और विधान सभाओं मे आए दिन जो गतिरोध देखने को मिलते हैं वे राजेन्द्र बाबू की विचार-धारा के परित्याग का ही परिणाम हैं। आज देश-हित का तकाजा है कि फिर से राजेन्द्र बाबू की नीतियों को अपनाया जाए और देश को अनेकों संकट से बचाया जाये।


rajender babu ki jayanti par bisesh

राम बालक रॉय
साभार क्रन्तिस्वर।कॉम


डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 03 दिसंबर 1884 को और  मृत्यु 28 फरवरी 1963 मे हुई थी । वह स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और स्वाधीनता आंदोलन मे उनकी अग्रणी भूमिका रही थी। उनकी मृत्यु के 48 वर्ष बाद भी उनके विचारों की प्रासंगिकता आज भी है और आज का राजनीतिक संकट उन विचारों से हट जाने के कारण ही उत्पन्न हुआ है। राजेन्द्र बाबू का व्यक्तित्व कैसे प्रभावशाली बन सका इसका विवेचन गत वर्ष किया था। 

राजेन्द्र बाबू का जन्म एक जमींदार परिवार मे हुआ था और उन्हें सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त थीं। वह काफी प्रतिभाशाली थे। वकालत पास करने के बाद यदि प्रेक्टिस करते तो और धनशाली ही बनते। किन्तु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें बुला कर उनसे कहा कि तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं है और वकालत करके खूब पैसा कमा लोगो लेकिन मै चाहता हूँ कि तुम देश-सेवा मे लगो  तो तुम्हारी प्रतिभा का लाभ देशवासियों को भी मिल सके। राजेन्द्र बाबू ने गोखले जी की सलाह को आदेश मान कर शिरोधार्य कर लिया और आजीवन उसका निर्वहन किया। जन्म से प्राप्त सुख-सुविधाओं का परित्याग करके सादगी ग्रहण करके राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन मे कूद पड़ना राजेन्द्र बाबू को असहज नहीं लगा।

गांधी जी और नेताजी सुभाष के मध्य मतभेद होने की दशा मे सुभाष बाबू ही 'नीलकंठ' बन कर सामने आए और कांग्रेस की अध्यक्षता सम्हाली। निराश-हताश कांग्रेसियों मे नव-जीवन का संचार करके राजेन्द्र बाबू ने अपने कुशल नेतृत्व से स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा दी। स्वातंत्र्य -समर के योद्धा के रूप मे राजेन्द्र बाबू को कई बार जेल-यात्राएं भी करनी पड़ी। जेल मे भी चिंतन-मनन उनकी दिनचर्या रहते थे। यहाँ तक कि जब एक बार जेल मे उनको कागजों का आभाव हो गया तो उन्होने कागज के नोटों पर भी अपने विचार लिख कर रख लिए थे। 'खंडित भारत' की रचना भी उन्होने जेल-प्रवास के दौरान ही की थी। इस पुस्तक से राजेन्द्र बाबू की दूर-दर्शिता का आभास होता है जो उन्होने आजादी से काफी पहले विभाजन से होने वाले दुष्परिणामों की कल्पना कर ली थी। लेकिन अफसोस कि उनकी सीख को नजर-अंदाज कर दिया गया और नतीजा भारत,पाकिस्तान तथा बांग्ला देश की जनता आज तक भोग रही है।

राष्ट्रपति बनने पर उन्होने 'राष्ट्रपति भवन' से रेशमी पर्दे आदि हटवा कर खादी का सामान -चादर,पर्दे आदि लगवाए थे जो उनकी सादगी-प्रियता का प्रतीक है। वह विधेयकों पर आँख बंद करके हस्ताक्षर नहीं करते थे बल्कि अपने कानूनी ज्ञान का उपयोग करते हुये खामियों को इंगित करके विधेयक को वांछित संशोधनों हेतु वापस कर देते थे और सुधार हो जाने के बाद ही उसे पास करते थे। उनके लिए जनता का हित सर्वोप्परि था। स्व . फख़रुद्दीन अली अहमद  द्वारा विदेश मे एमेर्जेंसी पर और श्री ए पी जे कलाम साहब द्वारा बिहार की राजद सरकार हटा कर राष्ट्रपति शासन लगाने के आदेश विदेश से देना राष्ट्रपति पद का अवमूल्यन करना है और  जो राजेन्द्र बाबू की नीतियों के उलट है। उनके उत्तराधजीकारी डॉ राधा कृष्णन भी कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नाडार के षड्यंत्र मे फंस कर एक बार तो संविधान विरोधी कार्य मे तत्पर हो गए थे जो नेहरू जी की सतर्कता से विफल हो गया था। किन्तु डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी ने नेहरू जी से तमाम मतभेदों के बावजूद कभी भी संविधान विरोधी कदम उठाने की बात नहीं सोची जबकि उन्हें तो जनता और सत्तारूढ़ पार्टी मे आदर -सम्मान भी प्राप्त था और समर्थन भी मिल सकता था।

आम धारणा है कि संविधान निर्मात्री समिति के चेयरमेन डॉ भीम राव अंबेडकर ही संविधान निर्माता हैं परंतु संविधान सभा के सभापति की हैसियत से राजेन्द्र बाबू का संविधान निर्माण मे अमिट योगदान है। उनकी कुशल अध्यक्षता मे ही संविधान की धाराओं पर सम्यक विचार-विमर्श और बहसें सम्पन्न हुई। 26 जनवरी 1950 से लागू संविधान डॉ राजेन्द्र प्रसाद के हस्ताक्षरों से ही पारित हुआ है। अतः उनके योगदान को नकारा नहीं जाना चाहिए ।

संसद और विधान सभाओं मे आए दिन जो गतिरोध देखने को मिलते हैं वे राजेन्द्र बाबू की विचार-धारा के परित्याग का ही परिणाम हैं। आज देश-हित का तकाजा है कि फिर से राजेन्द्र बाबू की नीतियों को अपनाया जाए और देश को अनेकों संकट से बचाया जाये।